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शुक्रवार, अक्तूबर 26, 2012

दहेज न लेने पर भी सजा मिलती है (टिप्पणियाँ)

दोस्तों  यह सब मैंने अपनी फेसबुक की "वाल" पर एक लेख "दहेज न लेने पर भी सजा मिलती है" लिखा था. उसके बाद मेरे अन्य दोस्तों / शुभचिन्तकों की टिप्पणी आई. उसमें से कुछ टिप्पणी और उसकी प्रतिक्रिया यहाँ पर रख रहा हूँ. 
Shivraj Prajapati रमेश जी आप वास्तव में बहुत परेशान हुये हैं ....
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati जी, दिल्ली पुलिस की जाँच अधिकारी ने पैसे लेने के लिए मुझे बहुत परेशान किया था. पैसे लेकर भी दिल को शांति नहीं मिली तो और अधिक पैसो की मांग करने लगी,यहाँ तक मेरे "लिंग" पर करंट लगाने की धमकी भी दी और मुझे अनेकों तरीके से परेशान रखा. दिल्ली पुलिस कमिश्नर युध्दवीर सिंह डडवाल के पास शिकायत भी की मगर कोई कार्यवाही नहीं हुई, क्योंकि सबको अपना हिस्सा मिलता है. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास "इच्छा मृत्यु" का भी प्रार्थना पत्र लिखा था. लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. यह है हमारे देश की न्याय व्यवस्था. जो सिर्फ "अन्याय" के सिवाय मुझे कुछ नहीं दें पाएगी.
दिनेशराय द्विवेदी फर्जी मुकदमा है तो खारिज हो जाएगा। अब मुकदमा तो सहन करना होगा। तभी तो जब बरी होंगे तो आप को खुशी हो सकेगी। सरकार गरीब है भाई। उस के पास अदालतें खोलने और जजों को नियुक्त कराने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। ईंधन पर पर्याप्त टैक्स लगाने पर भी यह हाल सरकार का है। यदि अदालतों की पर्याप्त व्यवस्था करनी पड़े तो आप खुद सोचें कि पेट्रोल का दाम कितना हो जाएगा। जनता कष्ट पाएगी। इस लिए अदालतें नहीं खोली जा सकतीं। आखिर जनता को क्यों कष्ट दिया जाए। वह पहले ही कम कष्ट में नहीं है। दिनेशराय द्विवेदी पुलिस के लिए जो कुछ फरियादी और उस के लाए हुए सच्चे-झूठे गवाह कह दें वही सच है। क्ई बार एफआईआर के मुताबिक गवाहों के बयान लिख लिए जाते हैं। इसी से आरोप पत्र बनता है। पहली नजर मं यह माना जाता है कि जो कुछ पुलिस द्वारा सबूत पेश किए हैं वे सत्य सिद्ध हो सकते हैं। इसी आधार पर मुकदमा चलाया जाता है। अधिकांश आरोप पत्र मिथ्या साबित होते हैं। इस कारण फरियादी चाहता है कि सजा हो न हो मुकदमा लंबा चलना चाहिेए। जिस से अभियुक्त को परेशान किया जा सके। त्वरित विचारण के लिए पर्याप्त अदालतें नहीं हैं। ऐसे में जनता को पीड़ा तो भुगतनी ही होगी।
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati का कहना कि-सर मै इस सम्बन्ध में ज्यादा कमेन्ट नहीं कर सकता लेकिन हम अपने यहाँ कोई ऐसा मामला आने पर माननीय न्यायलय के निर्देशों के अनुसार अंत तक परिवार को बचाने का प्रयास करते हैं, और बहुत मामलों में हम सफल भी हुये हैं. पुलिस का संवेदनहीन ब्यवहार उचित नहीं रहता. मेरी शुभ कामनाएं हैं की आप की बात जल्दी सुनी जाये और आपको न्याय मिले. रह गयी इच्छा मृत्यु की तो अभि उसकी जरुरत नहीं है हम लोग आपसे बहुत प्रेरणा ले रहे हैं, आप अलख जगाते रहे , अभि समाज को आपकी बहुत जरुरत है . वाह पथ क्या पथिक कुशलता क्या जिस पथ पर बिखरे शूल न हों, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जब धाराएँ प्रतिकूल न हों...हम सब आपके साथ हैं समय आने पर सब ठीक हो जायेगा यह समस्या प्रारब्ध मान कर स्वामी जी का प्रसाद मानकर लीजिये सब ठीक हो जायेगा .
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati जी, मेरे पास कई लोगों ने अपने अनुभव बांटे थें. उसी के आधार पर कह रहा हूँ कि आप बुरा ना माने आपके यु.पी. में तो बहुत बुरा हाल है. क्या आप जितने क्षेत्र के सहायक एस.पी है उतने इलाके के लिए मुझे सार्वजनिक (फेसबुक पर) वादा कर सकते हैं कि-दहेज मांगने के जितने भी केस दर्ज होते हैं. उनके केस पर अतिरिक्त ध्यान रखकर उन्हें परेशान होने से बचाने की कोशिश करेंगे और उनकी सही जाँच (आरोप पत्र में दर्ज) के नाम पर पैसों के लिए तंग किये जाने वाले शोषण पर अलग से ध्यान रखें और आज के युवा और खासतौर पर किसी बुध्दिजीवी (पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि आदि) का शोषण नहीं होने देंगे. उनका शोषण होने पर वो अपने लेखन पर ध्यान नहीं लगा पाते है और उनका सारा कार्य (मानसिक शांति ना होने के कारण) बंद हो जाता है. इस कारण वो बेचारे भूखे मरते हैं और बहुत अधिक स्वाभिमानी होने के कारण "भीख " भी नहीं मांग सकते हैं. हम बस यह कहते कि-आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा.फिर क्यों नहीं? तुम ऐसा करों तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनियां हमेशा याद रखें. धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य/कर्म कमाना ही बड़ी बात है.
Vijesh Patidar muje bhi isi tarha ke juthe arop me fasaya gaya hai.me bahot dukhi hu.aatmhatya hi aakhri rasta bacha hai
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapatiजी का कहना है कि रमेश जी ऐसा नहीं है उ.प्र. और यहाँ की पुलिस के विषय में आपकी धारणा गलत है. किसी अपवाद पर न जाते हुये मै यही कहना चाहता हूँ की उ.प्र. पुलिस किसी भी निर्दोष का उत्पीडन नहीं करती यहाँ थानों में पीड़ितों की सुनवाई होती है विवेचना का गुण दोष के आधार पर निस्तारण होता है दिल्ली के बाहर आकर देखिये हमारी पुलिस में बहुत सकारात्मक बदलाव आये हैं हम आप से वादा करते हैं की ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे आम आदमी की गरिमा से खिलवाड़ हो और बदमाशों को राहत मिले. दहेज़ उत्पीडन के मामले पहले जिला परामर्श केंद में सुने जाते हैं उसके बाद पुलिस के पास आते हैं . उ.प्र. में पुलिस संवेदनशील है आम जनता जागरूक और अधिकारी जिम्मेदार.
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati जी, क्या यह दिल्ली की तरह से "वुमंस सैल" का बदला हुए रूप का नाम ही "जिला परामर्श केन्द्र" है. यदि हाँ तो अवश्य ही जिला परामर्श केन्द्र में भी सौदेवाजी होती है. लडके का पक्ष सुना ही नहीं जाता होगा. जो अधिकारियों का मुँह भर सकता है या "बड़ी सिफारिश" लगवा सकता है. उसका ही पक्ष सुनते है. 
चर्चित निशा शर्मा केस भी यू.पी. का ही है. उसमें फंसे मेरे मित्र को नौ साल "अदालत" में चले मामले में दोषी नहीं माना. लेकिन इन नौ साल में उसका कैरियर बर्बाद हो गया. नौ साल कोर्ट के चक्कर लगाते हुए लाखों रूपये खर्च हो गए. क्या बिगाड़ लिया यू.पी. पुलिस और सरकार ने "निशा शर्मा" का ? क्या ठोस सबूत ना होते हुए भी लड़की द्वारा केस दर्ज करवाने की जिद पर "जिला परामर्श केन्द्र" इंकार कर पाता है ? वो बेचारे कानून से बंधे हुए होते है और केस दर्ज करने की कार्यवाही कर देते हैं. मैं आपको अपना उदाहरण देकर समझता हूँ कि थाना-कीर्ति नगर की वुमंस सैल के जाँच अधिकारी राधेश्याम ने मेरे सामने अपनी सीनियर को कहा था कि मैडम लड़की के पास कोई ठोस सबूत नहीं है अपनी बात साबित करने के लिए और लडके के पास ठोस सबूत है. अपनी बात साबित करने के लिए जबकि हमने लडके से इतनी बातें भी नहीं की है. लेकिन फिर भी मेरे ऊपर केस दर्ज है. उनका कहना था कि हमारी मजबूरी है केस दर्ज करना.  
आप बुरा ना माने यू.पी. पुलिस के बारें में कहावत मशहूर है कि वो तो गूंगे से बुलवा लेती है कि उसने अपराध किया है. जो उसने किये ही नहीं होते है. मैं सारे यू.पी. पुलिस की बात नहीं कर रहा हूँ. यदि आपको सिर्फ अपने जिले के अधिकारियों पर विश्वास है तो आप क्यों सार्वजनिक वादा करने से पीछे हट रहे है. कर दीजिए एक वादा इमानदारी के नाम. सच कहता हूँ पूरे देश में आप एक नई मिसाल कायम कर देंगे. आपके इलाके में जितने केस (दहेज प्रताडना) दर्ज है उनकी हकीकत भी सामने आ जायेगी. आज मैं भी अपने आपको ईमानदार पत्रकार कह सकता हूँ मगर जब सब पत्रकारों पर बात आती है. तब मैं भी निशब्द हो जाता हूँ, क्योंकि कुछ पत्रकारों ने अपनी "कलम" को कोठे की वेश्या बना दिया है. यदि आपकी तरह से हर बड़ा अधिकारी सार्वजनिक वादा करने लग जाए तो हम अपराध (दहेज प्रताडना)मुक्त भारत की कल्पना कर सकते हैं. मैं कभी नहीं कहता कि पुलिस किसी दोषी को छोड़े मगर किसी निर्दोष को "रिश्वत" के लालच में या "सिफारिश" के दबाब में शोषित भी ना करें. बाबा रामदेव की रामलीला मैंदान की घटना इसका उदाहरण है. थाने में बलात्कार की घटना (लखनऊ) भी यू.पी. ही की है. क्या वहाँ के थानाध्यक्ष का कोई कुछ बिगाड़ लेगा. वो कानून जानता है आरोप पत्र में तकनीकी कमियां करवा देगा. जैसे-जीप में दस पेटी शराब पकड़ी गई लेकिन लिख दिया जाता है स्कूटर पर दस पेटी शराब ले जाते हुए पकड़ा गया. यह सिर्फ उदाहरण है सिर्फ समझाने के लिए.जिससे आप अच्छी तरह से वाफीक होगें. मैं तो फिर वहीँ कहूँगा कि-" आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा.फिर क्यों नहीं? तुम ऐसा करों तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनियां हमेशा याद रखें. धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य/कर्म कमाना ही बड़ी बात है".
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati जी, आप सच का सामना नहीं कर पाए अपनी "वाल" से हमारी पोस्ट ही हटा दी. क्या इसी को "इंसाफ" कहते हैं. आप इस लिंक (नीचे) को पढ़ें यह आपके यू.पी. ही का है. अब मुझे पता कि आप जल्द ही मुझे अनफ्रैंड कर देंगे. लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मगर सच से मुँह नहीं चुराऊंगा. 
रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati का कहना है कि जैसी आप की इच्छा .....और आपको जो कहना है कह सकते है हम अपने दायित्त्वों का निर्वहन निष्ठा और इमानदारी से करते रहेंगे....जो गलत है गलत है और जो सही है सही है...इसके अलावा और कोई कमेन्ट नहीं कर रहा और इस पोस्ट भी हाईड(हटा) कर रहा हूँ. 
 रमेश कुमार सिरफिरा Shivraj Prajapati ji, यदि आप ईमानदार है तो आप पोस्ट को हटाकर अपनी कैसी छवि बना रहे है. मैंने भी कोई गलत नहीं कहा और ....जो गलत है गलत है और जो सही है सही है.. बस जो गलत है उसको गलत कहा है और जो सही है उसको सही कहा है. तब आप पोस्ट हटाकर क्या साबित कर रहे हैं ? अब मुझे केसों और जेल से डर नहीं लगता है. मौत आज भी आनी है और कल भी आनी है फिर डर कैसा ? डरता तो वो है जो गलत करता है.
Priti Gupta Ramesh ji ap ke vichar bhut ache h
Upasna Siag रमेश जी आपके साथ जो बीता वह बहुत अफ़सोस जनक है . हमारे देश में कानून का दुरूपयोग करने वाले ज्यादा है . जबकि जिनके लिए बने है उनको यह ज्ञात भी ना होगा . लेकिन जब आप गलत नहीं है तो आपको न्याय अवश्य ही मिलेगा . हालांकि आपने जो निर्दोष हो कर भुगतान किया है उसकी भरपाई नहीं होगी ...मेरी शुभकामना आपके साथ हैं ...
रमेश कुमार सिरफिरा Upasna Siag जी, आपका कथन सही है कि हमारे देश में कानून का दुरूपयोग करने वाले ज्यादा है . जबकि जिनके लिए बने है उनको यह ज्ञात भी ना होगा. असली पीड़ित के पास तो ना रिश्वत और ना सिफारिश होती है. कई बेचारे वकील की फ़ीस तक नहीं जुटा पाते हैं. मैंने अपनी पत्रकारिता के दौरान ऐसे कई अनुभव देखें है. एक स्वंय का हमारा भी रहा है. जब मेरी बड़ी बहन को सुसराल वालों ने सन-1985 में जलाकर मार दिया था. तब हमारा परिवार आर्थिक समस्या से जूझ रहा था. क्या ऊपर की अन्य टिप्पणी भी पढ़ी है. क्या आज सरकार में बैठे सांसद ने अपनी कार्यशैली द्वारा ऐसे हालत नहीं बना दिए है कि सभ्य आम आदमी और निर्दोष व्यक्ति हथियार उठाने के लिए मजबूर हो गया है. आज अदालतों की जनसंख्या के हिसाब से कितनी कमी नहीं है. जिसके कारण देरी से मिलने वाला न्याय, न्याय ना होकर अन्याय ही साबित होता है. मैंने ऊपर एक टिप्पणी में चर्चित निशा शर्मा के केस का भी जिक्र किया है.
Harshit Sufi इस कानून का जमकर दुरुपयोग हो रहा है आजकल
Kartik Zaveri दहेज दूषण ही है...!!!
Shreenath Alok सर मै आपके दहेज़ प्रथा वहिष्कार का सम्मान करता हूँ ..लेकिन क्या माँ बाप के संपत्ति-जायदाद में लडकी का कोई अधिकार नहीं ..?? यदि हाँ तो वही दहेज है और अगर ना तू ये एक जातिया है.. यदि संपत्ति में बेटा का अधिकार है तू बेटी का क्यूँ नहीं .....??  मेरा तो यही मान ना है की बेटी का भी उतना ही अधिकार है जितना के एक बेटा का ... मै भी दहेज के खिलाफ हूँ लेकिन क्या एक बेटी अपने घर से खाली हाथ चली जाई या वो सही है या फिर एक बेटी अपने अधिकार ले कर जाये वो सही है ..??
 
आप अंधे जजों के लिए आप एक लिंक जरूर पढ़े :-न्याय हो, तो हो और न हो,तो न हो  यहाँ पर मेरी टिप्पणी :-मुझे जज और क्लर्क का अज्ञान देखकर ऐसा लगता है कि अपनी अकल से नहीं बल्कि परीक्षा मे नकल से पास हुए है और नौकरी सिफारिश करके या रिश्वत देकर लगवाई है. आपने सच कहा है कि उस न्यायाधीश से कभी कोई यह नहीं पूछेगा कि उस ने खुद अपने ही न्यायालय का अमूल्य समय क्यों बरबाद किया? और यह भी नहीं पूछेगा कि उस गलत टिप्पणी करने वाले क्लर्क के विरुद्ध क्या कार्यवाही की गई।
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